Historical claims about Prithviraj Chauhan and Muhammad Ghori debated
कि हर मुस्लिम जो मोहम्मद गजनवी के मकबरे पे मत्था टेकने आया, पृथ्वीराज चौहान के शरीर पे पैर रख के जाए। वहां उनको मार दिया गया था। और वहां उन्होंने एक और रूल बनाया। कि उस मकबरे में मोहम्मद गजनवी के पास जाने के पहले आपको जूता उतारना है और जो पृथ्वीराज चौहान का जो वो बना हुआ है ना, उसपे चप्पल मारना है। हालांकि जो फिल्म आई थी पृथ्वीराज चौहान, वो असल में जो कहानियां हमने बचपन से पृथ्वीराज चौहान की सुनी है वो ऐसी नहीं है। जैसे पृथ्वीराज चौहान कुछ 12 या 13 बार मोहम्मद गजनवी को हरा के छोड़ दिए। तो हर बार हमला करता था वो हारता था, फिर छोड़ देते थे। बोले जाओ यार। ये हम लोगों की हमेशा से उस समय से आज तक हमारी यही गलती होती है कि हम खत्म नहीं करते। इतनी बार छोड़ने के बाद फिर एक बार मोहम्मद गजनवी बहुत बड़े प्रिपरेशन से आया। बंदा भी ढीठ ही था, बार-बार आ रहा था। तो मोहम्मद गजनवी ने 13वीं बार हमला किया। जिसपे वो पृथ्वीराज चौहान को हराया। लेकिन उसने वो गलती नहीं की जो पृथ्वीराज चौहान हर बार कर रहे थे। उसने नहीं छोड़ा। उसने नहीं छोड़ा। पृथ्वीराज चौहान का दोनों आंख फोड़ा और उसको अपने कारागार में डाल दिया। मतलब जेल में डाल दिया। कि तुम अब बचे पूरे जीवन अंधेरे में रहो। अंधेरे में रहो। पृथ्वीराज चौहान का एक ही लक्ष्य बच गया था। कि मेरे को मोहम्मद गजनवी को मारना है। कैसे करे? अंधा आदमी। तो वो जेल के अंदर अपने मंत्री को बता के प्रैक्टिस शुरू किए। आवाज पे तीर चलाना। मतलब शब्द भेदी बाण जिसको बोलते हैं। बिना आंखों के आप तीर मारेंगे और करेक्ट लगेगा। ये सच है? ये आपकी हिस्ट्री है? मोहम्मद गजनवी के पूरे राज्य में साल में एक बार जैसे जिसको आजकल आप और मैं एनुअल फंक्शन बोलते हैं ना, उस तरीके का एक बहुत बड़ा समारोह होता था। मोहम्मद गजनवी के लिए अलग से सिंहासन बनाया गया बहुत ऊंचा। उसमें कैदी भी आते थे। हां, मतलब जो भी अपना कोई आर्ट फॉर्म दिखा सकता है जिसकी वाहवाही हो रही है। वो आते थे और कोई कर तब दिखा रहा है, कोई डांस दिखा रहा है। तो ये आए। साथ में इनका मंत्री आया। दोनों कैदी। तो बोले दिखाओ। पृथ्वीराज चौहान को दो तीर दिया गया। दूर में कहीं पे एक बंदा कुछ घंटी या कुछ लेके खड़ा था कि मैं इसको आवाज करूंगा। और फिर एक तरफ से जहां से आवाज आई, पृथ्वीराज चौहान तीर चलाए और जो चीज से आवाज आई थी वो भेद दिया। भेद दिया। तो ऊपर बैठे-बैठे मोहम्मद गजनवी खुश हुआ और ताली बजा के बोला वाह। तो जैसे ही वो बोला, अब पृथ्वीराज चौहान को मालूम है आवाज कहां से आई है। हां। और ऊंचे से आई है। लेकिन कितने ऊंचे से आई है नहीं पता। तो उनका जो कविता में बात करने वाला मंत्री था ना, उसने बोला चार बांस 24 गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। चार बांस मेजरमेंट दे रहा है उसको। चार बांस, फोर बैंबूज़, 24 गज, 204 गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, 8 फिंगर्स। चार बांस 24 गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ताऊ ऊपर सुल्तान है मच्चू के चौहान। और बस वो बात ये कविता के तौर पे बोला वहां किसी को समझ में नहीं आया। और वहां से मोहम्मद गजनवी के मुंह के आर पार। गजनवी वहीं खत्म। वहां बैठा-बैठा वो आदमी मर गया वाह बोल के।
What's right
What's wrong
What's debatable
Breakdown
Historical Accounts vs. Folklore The narrative presented in the claim blends historical events with popular folklore and legends.
While Prithviraj Chauhan did defeat Muhammad Ghori in the First Battle of Tarain in 1191 [7][8], he was subsequently defeated and captured by Ghori in the Second Battle of Tarain in 1192 [2][3][5][8]. It is historically accepted that Ghori blinded Chauhan after his capture [1][2][4].
The Death of Muhammad Ghori However, the claim that Prithviraj Chauhan killed Muhammad Ghori by shooting an arrow based on his minister's guidance is largely attributed to folklore and poetic traditions, most notably the Prithviraj Raso [1][4][5]. Historical records indicate that Muhammad Ghori died in 1206, assassinated by the Khokhars or an Ismaili sect, and not by Prithviraj Chauhan, who is believed to have died around 1192 [4][5][8].
This timeline makes it impossible for a blinded and imprisoned Chauhan to have killed Ghori. Unsubstantiated Claims Furthermore, claims about Muslims being forced to step on Chauhan's body at Ghori's tomb are not supported by historical evidence found in the provided sources [1][8].
The narrative appears to be a conflation of historical events with legendary embellishments that have become popular over time. [1][2][3]